विविध रस गाथा
गाथा परिचय एवं स्रोत
यह रचना प्राचीन भारतीय वाङ्मय के विभिन्न स्रोतों से प्रेरित कथाओं, मंत्रों और साहित्यिक अंशों का एक संकलन है, जिसे आधुनिक पाठक के लिए पुनर्कल्पित किया गया है।
- प्रेरणा स्रोत: उपनिषद, वैदिक संहिताएँ, पुराण, संस्कृत काव्य एवं कथा साहित्य।
- रचनाकार: [आपका नाम या 'एक जिज्ञासु साधक']
- उद्देश्य: विभिन्न रसों – शांत, भक्ति, वीर, श्रृंगार, और करुण – का संक्षिप्त दिग्दर्शन कराना।
- संरचना: पाँच भाग, प्रत्येक एक विशिष्ट विषय और शैली पर केंद्रित।
- अस्वीकरण: यह एक मौलिक साहित्यिक कृति है और किसी विशिष्ट ग्रन्थ का शब्दशः अनुवाद नहीं है। पात्र और घटनाएँ काल्पनिक या पुनर्कल्पित हो सकती हैं।
भाग 1: उपनिषदों की अमृतवाणी
अतिप्राचीन भारत के मनीषियों ने गहन चिंतन द्वारा अस्तित्व के रहस्यों का उद्घाटन किया। उपनिषद उसी ज्ञान के भंडार हैं। यहाँ कुछ प्रमुख मंत्रों का सार प्रस्तुत है, जो हमें आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करते हैं:
1. ईशावास्यमिदं सर्वम्: ईश्वर इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। 2. तत्त्वमसि: वह (ब्रह्म) तुम ही हो। 3. अहं ब्रह्मास्मि: मैं ब्रह्म हूँ। 4. प्रज्ञानं ब्रह्म: चेतना ही ब्रह्म है। 5. असतो मा सद्गमय: मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। 6. तमसो मा ज्योतिर्गमय: मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। 7. मृत्योर्मा अमृतं गमय: मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। 8. सत्यमेव जयते नानृतम्: सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। 9. चरैवेति चरैवेति: चलते रहो, चलते रहो (पुरुषार्थ करते रहो)। 10. मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव: माता, पिता और गुरु देवता तुल्य हैं। ये सूत्र हमें जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
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भाग 2: स्वस्तिवाचन - मंगल कामना
वैदिक परंपरा में किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में देवताओं का आवाहन और मंगल कामना करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। स्वस्तिवाचन इसी का प्रतीक है। यह मंत्रोच्चार सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और वातावरण को शुद्ध बनाता है।
"ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥" अर्थात्, महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सम्पूर्ण ज्ञान के स्वामी पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें, जिनके चक्र की गति अवरुद्ध नहीं होती वे गरुड़ हमारा कल्याण करें, और ज्ञान के अधिपति बृहस्पति हमारा कल्याण करें। यह मंत्र चतुर्दिक शुभता और निर्विघ्नता की प्रार्थना है। ऐसे ही अनेक मंत्रों द्वारा हम ब्रह्मांडीय शक्तियों से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
भाग 3: भक्त प्रह्लाद की गाथा
पुराणों में अनेक प्रेरणादायक कथाएं हैं। भक्त प्रह्लाद की कहानी अधर्म पर धर्म की विजय और अटूट भक्ति का प्रतीक है। असुर राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को ईश्वर मानता था और अपने पुत्र प्रह्लाद द्वारा भगवान विष्णु की भक्ति से क्रुद्ध था।
अटल विश्वास
अनेक कष्ट और यातनाएं सहने के बाद भी प्रह्लाद का विश्वास डिगा नहीं। हिरण्यकशिपु ने पूछा, "कहाँ है तेरा विष्णु?" प्रह्लाद ने उत्तर दिया, "पिताश्री, वे तो कण-कण में व्याप्त हैं।" जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में एक स्तंभ पर प्रहार करके पूछा, "क्या इसमें भी है तेरा विष्णु?", तब स्तंभ फाड़कर नृसिंह भगवान प्रकट हुए।
"सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः। अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन् स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम्॥" (श्रीमद्भागवतम् ७.८.१७) - अपने सेवक (प्रह्लाद) के वचन को सत्य करने, समस्त प्राणियों में अपनी उपस्थिति दिखाने और अत्यंत अद्भुत रूप धारण करने के लिए, भगवान सभा में स्तंभ से प्रकट हुए – न पूर्णतः पशु, न पूर्णतः मनुष्य।
नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया, जिसे ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि वह न दिन में मरेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न मनुष्य से न पशु से, न अस्त्र से न शस्त्र से। नृसिंह अवतार ने इन सभी शर्तों को पूरा करते हुए सांयकाल में, देहरी पर, अपने नखों से उसका वध किया। यह कथा आस्था की शक्ति और ईश्वरीय न्याय को दर्शाती है।
भाग 4: कादम्बरी का एक अंश
महाकवि बाणभट्ट द्वारा रचित 'कादम्बरी' संस्कृत गद्य साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह जन्मान्तर के प्रेम और विरह की जटिल कथा है। यहाँ चन्द्रापीड और कादम्बरी के प्रथम मिलन का एक काल्पनिक, संक्षिप्त अंश प्रस्तुत है, जिसमें उत्सुकता और अनुराग का भाव है:
हेमकूट पर्वत पर, अप्सराओं के मध्य, राजकुमार चन्द्रापीड ने पहली बार गन्धर्व कुमारी कादम्बरी को देखा। श्वेत वस्त्रों में, कमल के समान नेत्रों वाली, वीणा बजाती हुई वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो साक्षात् सरस्वती ही हों। चन्द्रापीड ठिठक गया, उसकी दृष्टि हट न सकी। कादम्बरी ने भी जब उस तेजस्वी युवक को देखा, तो उसकी उंगलियाँ वीणा के तारों पर थम गईं। दोनों के हृदय में एक अव्यक्त स्पंदन हुआ। उनकी सखियों ने परिचय कराया, पर शब्द गौण थे, नेत्रों ने ही हृदय की भाषा कह दी थी। यह मिलन अल्पकालिक था, पर इसने अनंत विरह और प्रतीक्षा की नींव रख दी, जो कई जन्मों तक उनका पीछा करने वाली थी। बाणभट्ट का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक उस प्रथम दृष्टि के जादू को अनुभव कर सकता है।
भाग 5: धुंध में खोया प्यार
(यह अंश आधुनिक संवेदना और पश्चिमी साहित्य के दुःखांत प्रभाव को दर्शाता है) लंदन की एक धुंध भरी शाम थी। टेम्स के किनारे, अयान और क्लारा अक्सर मिला करते थे। अयान, भारत से आया एक महत्वाकांक्षी कलाकार, और क्लारा, एक स्थानीय संगीतकार। उनका प्रेम तीव्र था, जुनून से भरा, जैसे दो अलग-अलग संस्कृतियों का टकराव और संगम। वे घंटों कला, संगीत और अपने सपनों पर बातें करते। उनकी उंगलियाँ अक्सर मिलतीं, एक विद्युतीय तरंग दौड़ जाती।
उनकी निकटता बढ़ी, संवाद कम हुए, स्पर्श अधिक मुखर हो गए। अयान के स्टूडियो में, रंगों और कैनवस के बीच, उनका रिश्ता और गहरा हुआ। क्लारा के पियानो की धुनें अयान के चित्रों में उतरने लगीं। लेकिन उनकी दुनियाएं अलग थीं। सामाजिक दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और भविष्य की अनिश्चितता उनके जुनून पर भारी पड़ने लगी। एक शाम, तीखी बहस के बाद, क्लारा बिना कुछ कहे चली गई। अयान ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की, उसका अहंकार आहत था। उसने सोचा वह लौट आएगी। पर वह नहीं लौटी। कुछ हफ़्तों बाद, उसे खबर मिली कि क्लारा ने शहर छोड़ दिया है, शायद हमेशा के लिए। टेम्स पर धुंध अब और गहरी लगती थी, जैसे अयान के जीवन में छा गई हो। उसका प्यार अधूरा रह गया, एक कसक बनकर, एक अनपेंटेड कैनवस की तरह।



















































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