ज्ञानस्य प्रकाशः
पोस्ट का परिचय
कर्मण्येवाधिकारस्ते
जीवन यात्रा में हम सभी कर्मों के बंधन में बंधे हैं। प्रत्येक क्षण हम कुछ न कुछ करते हैं, सोचते हैं, और अनुभव करते हैं। परन्तु क्या हम अपने कर्मों के वास्तविक स्वरूप और उनके फलों के प्रति सजग हैं? श्रीमद्भगवद्गीता हमें इसी कर्म के रहस्य को समझने की दिशा दिखाती है।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(अध्याय २, श्लोक ४७)
इस प्रसिद्ध श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को, और उसके माध्यम से समस्त मानवजाति को, कर्म का गूढ़ सिद्धांत समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि हमारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। हमें न तो कर्मों के फल का कारण बनना चाहिए और न ही अकर्मण्यता में हमारी आसक्ति होनी चाहिए। यह निष्काम कर्मयोग का मूल मंत्र है।
फल की चिंता क्यों नहीं?
जब हम फल की इच्छा से कर्म करते हैं, तो हमारा मन चिंता, भय और अशांति से भर जाता है। सफलता मिलेगी या नहीं? परिणाम कैसा होगा? ये प्रश्न हमें कर्म की प्रक्रिया से विचलित कर देते हैं। हमारी ऊर्जा बंट जाती है और हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाते। इसके विपरीत, जब हम केवल कर्म पर ध्यान केंद्रित करते हैं, पूरी लगन और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो मन शांत और स्थिर रहता है। यह स्थिरता ही हमें कुशलता प्रदान करती है।
अकर्मण्यता, अर्थात् कर्म न करने में आसक्ति भी उतनी ही हानिकारक है। जीवन का स्वभाव ही गति और कर्म है। कर्म त्यागना संभव नहीं, किन्तु कर्मफल की आसक्ति त्यागी जा सकती है।
वीडियो: कर्मयोग की व्याख्या
फल की चिंता से उत्पन्न मानसिक तनाव हमारे शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। निष्काम कर्म हमें इस बोझ से मुक्त करता है और जीवन को अधिक सहज और आनंदपूर्ण बनाता है।
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